बाल्यावस्था के संबंध में
माता एवं पिता में बालकों के संबंध में यह भ्रम होता है कि "बालक प्रौढ़ व्यक्ति का ही लघु रूप है।" इस भ्रम के कारण माता-पिता अपने बालकों से यह उम्मीद करते हैं कि वे बल्यावस्था में ही वयस्कों के समान सभी व्यवहार करने लगें। बालक जब अपने माता पिता की उम्मीद को पूरा करने में असमर्थ रहते हैं तो उन्हें दंड दिया जाता है। इससे बच्चों के मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है, वे हीन भावना के शिकार हो जाते हैं और आत्मविश्वास खोने लगते हैं, जिस से उनका व्यक्तित्व विकास अवरूद्ध हो जाता है। माना जाता है की "बालक ही प्रौढ़ बनता है " किंतु बाल्यावस्था में वह प्रौढ़ों के समान परिपक्व नहीं होता है।